25.7 C
Harda
Thursday, January 15, 2026

समय से मानदेय नहीं मिलने से व्यथित होकर लोक अभियोजक सुखराम बामने ने दिया इस्तीफा… शहर में चर्चा

Must read

 

अखिलेश बिल्लौरे मो :- 9425638014

 

सुखराम बामने (लोक अभियोजक) — न्याय व्यवस्था के सच्चे प्रहरी, पर उपेक्षा से व्यथित…

हरदा :- लोक अभियोजक (Public Prosecutor) न्याय व्यवस्था का वह अटूट स्तंभ हैं, जो शासन की ओर से जनता के हित में अदालतों में पैरवी करते हैं। उनका दायित्व केवल अपराधियों को सजा दिलाना नहीं, बल्कि समाज में न्याय और विश्वास की भावना को जीवित रखना भी होता है। विशेष रूप से वे गरीब, असहाय और वंचित नागरिकों के लिए न्याय की आवाज़ बनते हैं, जो निजी वकीलों की फीस देने में सक्षम नहीं होते।

 

हरदा जिले के जिला एवं सत्र न्यायालय में पदस्थ सुखराम बामने, जो पिछले दो वर्षों से अपर लोक अभियोजक के रूप में सेवाएं दे रहे थे, ऐसे ही एक समर्पित और निष्ठावान विधि अधिकारी हैं। उन्होंने विशेष न्यायालय हरदा में शासन की ओर से गंभीर अपराधों — हत्या, दुष्कर्म, महिला उत्पीड़न और धोखाधड़ी जैसे मामलों में प्रभावी पैरवी की। उनकी मेहनत और ईमानदारी के परिणामस्वरूप कई अपराधियों को सजा मिली और पीड़ितों को न्याय प्राप्त हुआ।

 

परंतु, विडंबना यह है कि ऐसे समर्पित अधिकारी को शासन की ओर से समय पर मानदेय प्राप्त नहीं हुआ, जिसके कारण वे आर्थिक और मानसिक दोनों स्तरों पर अत्यंत व्यथित हुए। श्री बामने ने बताया कि प्रदेश के लगभग सभी जिलों में कार्यरत शासकीय अधिवक्ताओं को न्यायालय के चपरासी से भी कम मानदेय मिलता है। उन्होंने कहा — “हम न्याय के लिए लड़ते हैं, पर स्वयं न्याय से वंचित हैं। हमें औसतन 25,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलता है, जबकि हम निजी विधि व्यवसाय भी नहीं कर सकते। ऐसे में परिवार का भरण-पोषण कैसे हो?”

 

शासन की इस उदासीनता और विलंबित मानदेय नीति से दुखी होकर बामने ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने साफ कहा कि अब वे भविष्य में कभी शासकीय अधिवक्ता बनने का प्रयास नहीं करेंगे। उनका यह निर्णय केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के उन सैकड़ों लोक अभियोजकों की आवाज़ है जो आर्थिक असमानता और उपेक्षा का सामना कर रहे हैं।

 

लोक अभियोजक का कार्य अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है। उन्हें साक्ष्य एकत्रित करने, गवाहों को न्यायालय में लाने और न्याय प्रक्रिया को निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ाने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बावजूद इसके, शासन का रवैया उनके प्रति संवेदनशील नहीं दिखाई देता। न्याय तंत्र में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होते हुए भी उन्हें वह सम्मान और पारिश्रमिक नहीं मिलता, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं।

 

वकील सुखराम बामने का कहना है कि शासन को चाहिए कि वह लोक अभियोजकों की स्थिति पर गंभीरता से विचार करे और उनके मानदेय को न्यायोचित स्तर पर बढ़ाए। “जब न्याय के प्रहरी ही आर्थिक असुरक्षा में होंगे, तो न्याय व्यवस्था की नींव कैसे मजबूत रह पाएगी?”

 

वास्तव में, लोक अभियोजक केवल सरकारी वकील नहीं, बल्कि न्याय की आत्मा हैं। वे समाज और न्यायालय के बीच वह पुल हैं जो कानून पर जनता का विश्वास बनाए रखते हैं। श्री सुखराम बामने जैसे अधिकारी न केवल न्याय के प्रति अपनी निष्ठा और ईमानदारी का उदाहरण हैं, बल्कि यह भी याद दिलाते हैं कि न्याय की डगर पर चलने वालों को भी सम्मान और स्थायित्व मिलना चाहिए।

 

यदि शासन समय रहते इन लोक अभियोजकों की समस्याओं पर ध्यान नहीं देगा, तो न्याय तंत्र की जड़ें कमजोर होंगी। अतः आवश्यक है कि सरकार लोक अभियोजकों के मानदेय और अधिकारों में सुधार करे, ताकि जो लोग न्याय के प्रहरी हैं, वे स्वयं अन्याय का शिकार न बनें।

- Advertisement -spot_img

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_img

Latest article